अरमान
अरमान जगे थे आज से साल भर पहले,
ख्वाहिश-ए-दिल थी पूरा करने की उसे |
याद आते है हर पल हर वक्त हर वो लम्हा,चाह कर भी ना भूल पाता हुँ वो सपना जिसके कारण,
अरमान जगे थे आज से साल भर पहले |
दिल को रोक रखा था ना जाउँगा उस राह में,
मालूम था मुझे एक दिन जरूर गड़ जाएंगे काटे पाँव मे,
फिर भी भूल गया उन काटों को और खो गया उस खुशबु में,
जिसके कारण,
अरमान जगे थे आज से साल भर पहले |
नींद खुलती थी उन यादों की मुस्कान में और रात होती थी उस सपने की आगोश में,
कौन जानता है मुस्कान युँ थम जाएगा और सपना युँ टूट जाएगा |
क्योंकि आज भी अधूरे है वो जो,
अरमान जगे थे आज से साल भर पहले |
सोचता हुँ जिद रखु या छोड़ दुँ उस अरमान को,
समेट लु उस अरमान को और नई राह में आगे बढ़ु |
पर फिर भी डर लगता है कि फिर ना कहुँ मैं कि,
अरमान जगे थे आज से साल भर पहले |
रविशंकर जंघेल